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“फिर एक नया प्रतिबंध” 21.05.2026

जब वाशिंगटन ने यह सोचा था कि एक कागज पर दस्तखत करके वह भारत जैसे देश को घुटनों पर ले आएगा, तो शायद वह भूल गया कि यह सोनिया गांधी या मनमोहन सिंह की सरकार नहीं है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के तेल पर लगे प्रतिबंधों से छूट की समय सीमा खत्म कर दी और यह उम्मीद की कि नई दिल्ली में हड़कंप मच जाएगा।

पश्चिमी मीडिया ने बड़े-बड़े अक्षरों में कहानियां गढ़ना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार अब भीख मांगेगी और तेल खरीदने की भीख मांगने वाशिंगटन जाएगी। लेकिन भारत ने वह किया जो हमेशा से उसकी ताकत रहा है—उनके ही जाल में उन्हें फंसा दिया।

यह कोई गुप्त जानकारी या छुपी हुई बात नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने पश्चिमी मीडिया की आंखों में आंखें डालकर साफ कर दिया कि भारत ने रूस का तेल प्रतिबंधों से पहले भी खरीदा था, प्रतिबंधों के दौरान भी खरीदा और आगे भी खरीदता रहेगा।

अमेरिका छूट दे या ना दे, भारत के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती। रूस से आने वाले तेल की रफ्तार इस समय पानी के बहाव से भी तेज है और आज की तारीख में रूस के कुल तेल निर्यात का 40% हिस्सा अकेला भारत खरीद रहा है।

ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स जैसे पश्चिमी समाचार संस्थान पिछले कई हफ्तों से यह झूठ फैलाने में लगे थे कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत रूस से तेल नहीं खरीद पाएगा और हमारी अर्थव्यवस्था पूरी तरह बिखर जाएगी। उन्होंने बिना किसी नाम या सोर्स के यह दिखाना शुरू किया कि भारत के अधिकारी खुद कह रहे हैं कि मोदी जी को झुक जाना चाहिए।

द वायर जैसी फटी शेरवानी वाले चैनलों और वेबसाइटों ने इस नैरेटिव को देश के भीतर हवा देने की कोशिश की, ताकि विपक्ष को एक मुद्दा मिल सके। जब यह चाल काम नहीं आई, तो नॉर्वे में एक तथाकथित पत्रकार को आगे करके भारत में अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल उठाए गए, जो खुद को संभाल नहीं पाई और मुंह छिपाकर भाग खड़ी हुई।

हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ब्रिक्स बैठक में साफ कर दिया कि किसी एक देश द्वारा यह तय करना कि कोई किससे तेल खरीदेगा या कौन सी मुद्रा में व्यापार करेगा, पूरी तरह गैरकानूनी है। भारत इन प्रतिबंधों को बिल्कुल नहीं मानता। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी भारत की धरती से यह भरोसा दिया है कि चाहे जो हो जाए, रूस भारत को तेल की सप्लाई कभी नहीं रोकेगा।

भारत और रूस ने मिलकर एक ऐसा रास्ता निकाल लिया है जिसे रोकना नामुमकिन है। हम डॉलर को पूरी तरह बायपास करके रुपए और रूबल में व्यापार कर रहे हैं, जहाजों का बीमा भारतीय कंपनियां कर रही हैं और लंदन के वित्तीय सिस्टम की हमें कोई जरूरत नहीं बची है।

जब पूरी दुनिया में तेल की कमी हो रही है और यूरोपीय देशों में गैस और तेल की कीमतें दो से तीन गुना बढ़ चुकी हैं, तब भारत में कारखाने बिना रुके चल रहे हैं। पाकिस्तान जैसे देश का यह हाल है कि वहां रात 9 बजे के बाद तेल और गैस मिलना बंद हो गया है।

अमेरिका चाहता है कि दुनिया भर की रिफाइनरियां बंद हो जाएं ताकि वह खुद सबसे बड़ा तेल निर्यातक बनकर बाकी देशों को बर्बाद कर सके। मनमोहन सिंह की सरकार ने अमेरिका के कहने पर तेल खरीदना बंद कर दिया था और देश की मुद्रा का 50% अवमूल्यन कर दिया था, लेकिन आज का भारत अपने 140 करोड़ नागरिकों के हितों को किसी विदेशी राष्ट्रपति को खुश करने के लिए दांव पर नहीं लगा सकता।

डोनाल्ड ट्रंप को लगता है कि वह देशों को डराकर अपने सामने झुका लेंगे, लेकिन भारत कोई पाकिस्तान नहीं है जो धमकी मिलते ही पालतू बन जाए। जब अमेरिका ने कहा कि रूस से तेल बंद करो और हमसे खरीदो, तो भारत ने सीधा जवाब दिया कि रूस हमें 30% छूट पर तेल दे रहा है, तुम इस कीमत की बराबरी कर लो। इस बात का जवाब वाशिंगटन के पास नहीं था। भारत अपनी अर्थव्यवस्था को हर तरह के बाहरी दबाव से सुरक्षित रख रहा है और यह नीति पूरी तरह से अटल है।

पश्चिमी देश अब भारत को दबाने के लिए नए बहाने ढूंढेंगे, कभी टैक्स लगाने की धमकी देंगे तो कभी मानव अधिकारों का रोना रोएंगे। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जो तत्व जमीनों पर कब्जा कर रहे थे या अवैध गतिविधियां चला रहे थे, जब उन पर कार्रवाई होती है तो विदेशी मीडिया को दर्द होने लगता है।

अब दुनिया एकध्रुवीय नहीं रही जहां सिर्फ एक देश की दादागिरी चलेगी। भारत ने साफ कर दिया है कि हम अपना भविष्य खुद तय करेंगे और तेल वहीं से खरीदेंगे जहां से हमें सही कीमत और सुरक्षित सप्लाई मिलेगी।

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